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भारत के लोक हृदय में आषाढ़

  भारत के लोक हृदय में आषाढ़ जेठ की तपन से झुलसी, दरकी और हांफती वसुंधरा के कंठ जब चातक की मानिंद प्यासे हो उठते हैं, तब कालिदास के यक्ष का मेघ-दूत केवल अलकापुरी का मार्ग नहीं नापता, बल्कि भारत के लोक-हृदय में 'आषाढ़' बनकर उतर आता है। आषाढ़ भारतीय संस्कृति के लोकाकाश में एक महा-उत्सव है, एक ऐसा अनुष्ठान है जहाँ प्रकृति और पुरुष, मेघ और मिट्टी, राग और विराग मिलकर एक नई सृष्टि का सृजन करते हैं। इस ऋतु का आगमन किसी राजा की सवारी की तरह होता है; जहाँ बादलों के नगाड़े बजते हैं, बिजलियां चंवर ढूरती हैं और पुरवाई अपने गीले हाथों से धरती का श्रृंगार करने दौड़ पड़ती है। आषाढ़ की पहली फुहार गिरते ही जो सोंधी महक उठती है, वह सदियों के लोक-जीवन, श्रम और आस्था की सामूहिक गंध है। पंडित विद्यानिवास मिश्र जब 'फागुन का मन' टटोलते हैं, तो कहीं न कहीं उनकी चेतना में आषाढ़ का वह गंभीर और गहरा रूप भी कौंधता होगा, जिसे उन्होंने 'पानी की पुकार' कहा था। आषाढ़ की इस पुकार को यदि सही मायने में सुनना हो, तो लोकगीतों की उन अनाम तानों में उतरना होगा, जहाँ बादलों की गड़गड़ाहट के बीच भी मनुष्...