संदेश

भाषा दीवारें खड़ी करने नहीं, पुल बनाने के लिए होती है

चित्र
भारत में भाषा का प्रश्न कभी भी मात्र संचार का विषय नहीं रहा, यह संस्कृति, अस्मिता और राजनीति से भी गहराई से जुड़ा रहा है। विशेष रूप से हिंदी को लेकर, विभिन्न राज्यों में समर्थन और विरोध की धाराएँ लगातार चलती रही हैं। तमिलनाडु में हिंदी विरोध का स्वर सबसे मुखर रहा है, जिसे हाल ही में मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने पुनः हवा दी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विरोध वास्तव में भाषाई असहमति का परिणाम है, या फिर यह राजनीति से प्रेरित एक सोचा-समझा कदम है? स्वतंत्रता के बाद, जब भारत को भाषाई आधार पर पुनर्गठित किया गया, तब यह स्पष्ट हो गया था कि विविध भाषाओं वाले इस देश में एक संप्रेषणीय माध्यम आवश्यक होगा। हिंदी, जिसे उस समय देश की लगभग 40% आबादी बोलती थी, इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त मानी गई। इसे 1950 में संविधान में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और बाद में इंदिरा गांधी ने यह सुनिश्चित किया कि अंग्रेज़ी भी सह-आधिकारिक भाषा बनी रहे, जिससे गैर-हिंदी भाषी राज्यों को कोई असुविधा न हो। तमिलनाडु और कुछ अन्य राज्यों में यह आशंका व्यक्त की गई कि हिंदी के...

भारतीय गौरवगान के प्रतिनिधि कवि श्री अटल बिहारी वाजपेयी

भारतीय गौरवगान के प्रतिनिधि कवि श्री अटल बिहारी वाजपेयी  श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी का जीवन छलकता हुआ अमृत कुंभ है। हर व्यक्ति अपनी पात्रता के अनुसार कुछ न कुछ ग्रहण कर जीवन को सार्थक बना सकता है। अटल जी के व्यक्तित्व के विराट विस्तार की शीतल छांव जीवन की टूटती आस्थाओं में प्राणों का संचार करती है।  एक राजनेता के रूप में बहुधा लोग उन्हें अधिक जानते हैं किंतु एक कवि रूप में वह कम ही अभिव्यक्त हैं। उनकी काव्यात्मक अभियोग्यताओं का उचित मूल्यांकन न हो पाने के कारण हिंदी साहित्य में वह अपने पूरे वैभव के साथ प्रकट न हो सके। यह साहित्य के साथ जानबूझ कर किया गया अपराध है।   बहरहाल, उनकी कविताओं में भारत की मूलभूत समस्याओं का समाधान झांकता है, प्राचीन गौरव झलकता है। भारतीयता का पुट दिखता है। वास्तव में अटल जी उदीयमान भारतीयता के गायक है, राष्ट्रीयता के नायक हैं, संस्कृति के वाहक कवि हैं जिनकी रचनाओं में सांस्कृतिक जागरण की ध्वनि विद्यमान है।  अटल जी की रचनाओं में राष्ट्र की आत्मा है, सभ्यता का गौरव है। अटल जी ने ...

मानवता के लिए खतरनाक है पर्यावरण से खिलवाड़

मानवता के लिए खतरनाक है पर्यावरण से खिलवाड़   स्वच्छ प्रकृति का साथ पुरखों की तरह होता है। प्रकृति का सानिध्य हमेशा हमें अपनापन देता है, संरक्षण देता है। एकमात्र यही वह जगह है जहाँ हमारी भौतिक उपलब्धियों का ब्यौरा नही लिया जाता। हमारी असफलताओं का हिसाब नही माँगा जाता है। भारतीय सनातन संस्कृति में सदियों से प्रकृति के समस्त उपादान श्रद्धा के केंद्र रहे हैं। प्रकृति हमारे दैनिक-सामाजिक जीवन को सुचारू, सरल और सहज बनाएँ रखती है, साथ ही स्वस्थमय, रचनात्मकता से भरपूर्ण परिवेश उपलब्ध कराती है जिसके सानिध्य में हम जीवन के नित नए प्रतिमान गढ़ते हैं।  किंतु आज का स्वार्थी मानव लगातार माँ स्वरूपी इस प्रकृति के सुंदर रूप से छेड़छाड़ कर रहा है। अपने निजी लाभ के लिए संसाधनों का निरंतर दोहन कर पर्यावरण असंतुलन की समस्या को जन्म दे दिया है। जिसकी परिणीति आज आपदाओं के रूप में हमारे सामने दृष्टिगोचर होती है। अभी हाल ही में उत्तराखंड के चमोली जिले में गैलिशियर पिघलने की घटना भी एक मानव जनित आपदा है। यहां यह समझना जरूरी है कि यह पूरी तरह प्राकृतिक आपदा नहीं है। हर बार एक रुकावट यानी बांध को तोड़...

चलिए थोड़ा मुस्कुराते है

https://www.google.com/adsense/new/u/0/pub-4012471650255133/home?hl=en (sc_adv_out = window.sc_adv_out || []).push({ id: 828206, domain: "n.ads1-adnow.com", });

उपचुनाव: दांव पर सिंधिया की साख

चित्र
loading...  उपचुनाव: दांव पर सिंधिया की साख Pic credit- Google मध्यप्रदेश की राजनीति के केंद्र में इन दिनों ज्योतिरादित्य सिंधिया छाए हुए हैं क्योंकि, ये उनके राजनीतिक जीवन का सबसे प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव है। उनके 19 विश्वस्त साथियों के बहाने उनकी साख दांव पर लगी है। 28 विधानसभा सीटों पर मध्यप्रदेश में हो रहे उपचुनाव दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों के बीच की महज सियासी जंग नहीं है। ये उपचुनाव सीधे-सीधे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के फैसले को सही और गलत ठहराने का इम्तिहान है। इसे उनकी राजनीति की अग्निपरीक्षा भी माना जा सकता! यदि वे इस परीक्षा में सफल होते हैं, तो उनके लिए भाजपा के नए दरवाजे खुल जाएंगे। पर, यदि ऐसा नहीं होता है, तो उपचुनाव की हार का सारा खामियाजा सिंधिया पर थोपा जाना तय है। ऐसे में उनके साथी भी उनसे कन्नी काट सकते हैं। उपचुनाव की 28 में से 19 सीटें ऐसी हैं, जो सीधे सिंधिया-घराने के प्रभाव में है।  भाजपा ने भी इनका दारोमदार पूरी तरह से सिंधिया को सौंप दिया। इन सीटों पर भाजपा की जीत का श्रेय यदि सिंधिया...

श्री कृष्ण: श्रीमद्भगवद गीता

loading... श्रीकृष्ण के उपदेशों को भूलते हम  श्रीकृष्णचन्द्र को पूर्णावतार कहा गया है जिनमें सभी कलाओं का पूर्णरूपेण विकास हुआ है। यदि बचपन में ही उन्होंने गोपियों के प्रति अलौकिक, असाधारण प्रेम का परिचय दिया है तो उसी अवस्था में दूसरी ओर कंस के भेजे हुए अनेकानेक असुरों का वध करके अलौकिक शक्ति और शौर्य का भी दृष्टान्त उपस्थित किया है। यदि गीता का ज्ञान रण-स्थल में उन्होंने अर्जुन को दिया है तो समय-समय पर अपनी चातुरी और सांसारिक बुद्धिमत्ता से पाण्डवों को अर्थ-संकट और धर्म-संकट से भी बचाया। यदि वह अनेक रानियों और पटरानियों के पति हुए हैं तो साथ ही स्थिरप्रज्ञ योगी भी रहे हैं। श्रीकृष्ण शास्त्र-शस्त्रविद् हैं, कला-कोविद हैं, राजनीति-विशारद हैं, योगी हैं, दार्शनिक हैं। सभी एक साथ हैं और सबमें महान् हैं। जब हम श्री कृष्ण के समग्र जीवन को देखते हैं तो मुख्यतः हमें उनके तीन रूप दिखाये देते हैं 1) धर्म संस्थापक कर्मयोगी कृष्ण 2) गोपी जनवल्लभ और राधाकृष्ण 3) बाल गोपाल ऐतिहासिक-आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से कृष्णचरित्र का प्रथम रूप सबसे अधिक महत्वपूर्ण और आत्मसात करने योग्य है। यह...

शिकागो व्याख्यान: हमारी सुशप्त स्मृतियों को झकझोरते स्वामी विवेकानंद

चित्र
  शिकागो व्याख्यान: हमारी सुशप्त स्मृतियों को झकझोरते स्वामी विवेकानंद स्वामी जी का व्याख्यान और आचरण पराधीन सुषुप्त धमनियों में रक्त संचार का स्त्रोत रहा। उन्होंने हमारी शिथिल हो चुकी मनोवृत्ति को झँकझोरा और विश्व को बताया कि हम किन महान अपादानों से बने हैं। कौन सा खून हमारी नसों में बह रहा है। विश्व मंच पर सभी धर्मों के प्रतिनिधित्वकर्ताओं की उपस्थिति में उन्होंने अपनी गौरवशाली अतीत को स्मरित करते हुए कहा कि हमने उस पावन पूण्य भूमि में जन्म लिया है जहाँ मनुष्य-प्रकृति तथा अंतर्जगत के रहस्योद्घाटन की जिज्ञासाओं के अंकुर उगे थे, हम उस सनातन की संतान हैं जहाँ आत्मा का अमरत्व, अंतर्यामी ईश्वर एवं जगतप्रपंच तथा मनुष्य के भीतर व्याप्त सर्वव्यापी परमात्मा विषयक का पहलेपहल उद्भव हुआ था। pic credit- Google    स्वामी जी हमारी संस्कृति के उद्घोषक पुरुष है। वह विश्व को याद दिलाते है कि भारत ही सभी धर्मों की जन्मस्थली है, यह वही भूमि है, वही देश है यहाँ से उमड़ती हुई बाढ़ की तरह धर्म और दार्शनिक तत्वों ने समग्र संसार को बार-बार पल्लवित किया और जो शताब्दियों के आघात एवं विदेशियों के शत...