अभिनंदन की वापसी से सजा सियासी बाजार
अभिनंदन की वापसी से सजा सियासी बाजार
भारतीय वायु सेना के जांबाज़ विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान की स्वदेश वापसी से देशभर में खुशी की लहर हैं। लोगों की जुबां पर अभिनंदन के शौर्य और पराक्रम की कहानी हैं, देश का कोना-कोना अभिनंदन के साहस को सलाम कर रहा हैं और उसके पराक्रम के सामने नतमस्तक हैं। होना भी चाहिए क्योंकि विंग कमांडर का साहस अदम्य हैं, अनुकरणीय हैं और गौरवान्वित करने वाला हैं किंतु दुर्भाग्य से इसे बाजार और सियासत की नजर लग गई हैं।
हर कोई अभिनंदन की वीरता को बेचने में लग गया हैं। कोई वोट के लिए, कोई पैसे के लिए, कोई अपने व्यापार के लिए। अभिनंदन के शौर्य को भुनाने के लिए सियासी दल और बाजार मुँह खोले बैठे हैं। सारे रास्ते-चौराहे अभिनंदन और प्रधानमंत्री की तस्वीरों वाले होल्डिंगों से भरे पड़े हैं, चुनावी रथ सेना के शौर्य से लदे हैं। वे अभिनंदन और एयर स्ट्राइक के नाम की बंशी बजा अपने सरकते जनाधार को बचाने तथा लोगों को अपने पाले में करने की जुगत में हैं। एयर स्ट्राइक पर कर्नाटक में एक नेता सीटें गिन रहे हैं। अभिनंदन इन लोगों के लिए सियासी माल बन गए हैं जिसका भरपूर इस्तेमाल सत्तापक्ष द्वारा अपने राजनैतिक फायदे के लिए किया जा रहा हैं। अन्य राजनैतिक दल इस मामले में स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं कि उनके रणनीतिकार इसे भुनाने में असफल रहे।
कही पढ़ा था कि वीरता, शौर्य कभी अमेजन पर आर्डर करने से नही मिलती लेकिन आप खुद देखिए कितनी बेशर्मी के साथ सेना और अभिनंदन के शौर्य और वीरता को खुलेआम बेचा जा रहा हैं। हालांकि यह पहला अवसर नही हैं जब सेना और सैनिकों का उपयोग सत्तारूढ़ दल ने राजनैतिक महत्वाकांक्षा को साधने के लिए किया हैं। इससे पहले भी मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक का इस्तेमाल भी ऐसे ही अपने चुनावी समर में किया था जिसकी कीमत उसे तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों तथा कई उपचुनावों में चुकानी पड़ी। चुनावी मंचों पर पुलवामा शहीदों की तस्वीर लगाकर संबोधित करना, चुनावी रथों द्वारा सेना के पराक्रम को अपनी राजनीति के लिए भुनाना कतई सही नही। सेना को सियासत का टूल बनाकर भारी गलती की जा रही हैं, ऐसा करने पर सेना का मनोबल तो टूटता ही हैं साथ ही उसकी विश्वनीयता भी कम होती हैं।
यह हमारे देश कि विडम्बना हैं कि पिछले कुछ दशकों से सियासी दलों असल मुद्दों को भुलाकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं। चाहे वह भाजपा हो, काँग्रेस हो या अन्य कोई दल सभी मुद्दों की राजनीति छोड़ जाति-धर्म, मंदिर-मस्जिद की बात करते हैं। किसी को देश की चिंता नही हैं, देश का विकास उनका मुद्दा नही रहा। रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार के मुद्दे पर वह कोई बात नही करना चाहते। बस एक-दूसरे आरोप-प्रत्यारोप कर अपनी चुनावी वैतरणी पार करना ही उनका एकमात्र मकसद हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि वे अपने निज स्वार्थ के लिए अब सेना को भी सियासत की खिलौना बनाना चाहते हैं।
भारत के परिपक्व लोकतंत्र में असल मुद्दों को ताक पर रखकर भावनात्मक विषयों को बेचने की परम्परा नयी नहीं है। इससे पहले दूसरे रूप में ऐसे प्रयोग हो चुके हैं और उसके प्रतिफल भी मिले हैं। सवाल ये है कि आखिर ये सब कब तक होगा ?क्या सचमुच राष्ट्रवाद हमारे लिए एक बिकाऊ चीज है? क्या आपको लगता है की विंग कमांडर अभिनंदन का शौर्य सिनेमा बनाकर या चुनावी रथ बनाकर इस्तेमाल किये जाने लायक है?
@पुरु_शर्मा
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