श्री कृष्ण: श्रीमद्भगवद गीता

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श्रीकृष्ण के उपदेशों को भूलते हम


 श्रीकृष्णचन्द्र को पूर्णावतार कहा गया है जिनमें सभी कलाओं का पूर्णरूपेण विकास हुआ है। यदि बचपन में ही उन्होंने गोपियों के प्रति अलौकिक, असाधारण प्रेम का परिचय दिया है तो उसी अवस्था में दूसरी ओर कंस के भेजे हुए अनेकानेक असुरों का वध करके अलौकिक शक्ति और शौर्य का भी दृष्टान्त उपस्थित किया है। यदि गीता का ज्ञान रण-स्थल में उन्होंने अर्जुन को दिया है तो समय-समय पर अपनी चातुरी और सांसारिक बुद्धिमत्ता से पाण्डवों को अर्थ-संकट और धर्म-संकट से भी बचाया। यदि वह अनेक रानियों और पटरानियों के पति हुए हैं तो साथ ही स्थिरप्रज्ञ योगी भी रहे हैं। श्रीकृष्ण शास्त्र-शस्त्रविद् हैं, कला-कोविद हैं, राजनीति-विशारद हैं, योगी हैं, दार्शनिक हैं। सभी एक साथ हैं और सबमें महान् हैं।


जब हम श्री कृष्ण के समग्र जीवन को देखते हैं तो मुख्यतः हमें उनके तीन रूप दिखाये देते हैं

1) धर्म संस्थापक कर्मयोगी कृष्ण

2) गोपी जनवल्लभ और राधाकृष्ण

3) बाल गोपाल

ऐतिहासिक-आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से कृष्णचरित्र का प्रथम रूप सबसे अधिक महत्वपूर्ण और आत्मसात करने योग्य है। यह रूप हमें महाभारत में सुरक्षित मिलता है । इन कृष्ण को हम अाजकल के शब्दों में राजनीतिज्ञ तथा दार्शनिक कह सकते हैं— आसुरी प्रवृत्तियों के प्रतीक कंस, जरासंध, जयद्रथ, दुर्योधन आदि का नाश करानेवाले तथा आर्य-धर्म के प्रतिनिधि पाण्डवों के पक्ष के समर्थक। धर्म संस्थापन में अपने-पराये का भेद व्यर्थ है, यह तो आदर्श की रक्षा का प्रश्न है, फलतः अर्जुन के मोह को दूर करने के लिये इन्होंने धर्मक्षेत्र-स्वरूप कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध के अवसर पर गीता का उपदेश दिया तथा अधर्म-पक्ष के समर्थक भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य जैसे गुरुजनों का वध कराने में भी इन्हें लेशमात्र संकोच नहीं हुआ। आसुरी प्रवृत्तियों को कुचलने के लिये आसुरी उपायों का अवलंबन भी अनुचित नहीं बल्कि आवश्यक हो सकता है- आर्य धर्म तो आर्यों के आपस के व्यवहार के लिए है- यह भी एक अत्यंत महत्व पूर्ण संदेश इनके अनेक व्यवहारों और उपदेशों से स्पष्ट है। 

किन्तु इन कृष्ण को और इनके सच्चे संदेश को भारतवासियों ने भुला दिया। फलतः आसुरी शक्तियों को कुचलने और आर्यधर्म की रक्षा करने की शक्ति देश ने खो दी। पर श्रीकृष्णजी को जनता कैसे भुला सकती थी? उनके चरित्र का एक नया पहलू धीरे-धीरे कवियों, दार्शनिक पण्डितों और धर्माचार्यों ने विकसित किया। यह थे गोपीजन-वल्लभ कृष्ण। अंत में इन्होंने ही राधाकृष्ण का रूप धारण कर लिया। कृष्णचरित का यह रूप हमे महाभारत में विशेष नही मिलता, परंतु हरिवंश पुराण, श्रीमद्भागवत, गीत गोविन्द, विद्यापति पदावली द्वारा प्रभावित साहित्य में निरंतर विकसित होता दिखाई देता है। गोपीकृष्ण और राधाकृष्ण की संयोग-वियोग लीलाओं के सामने महाभारत के राजनीतिज्ञ श्री कृष्ण के चरित्रों और उपदेशों की जनता को बिलकुल सुध नही रही।

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