उपचुनाव: दांव पर सिंधिया की साख

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 उपचुनाव: दांव पर सिंधिया की साख


Pic credit- Google


मध्यप्रदेश की राजनीति के केंद्र में इन दिनों ज्योतिरादित्य सिंधिया छाए हुए हैं क्योंकि, ये उनके राजनीतिक जीवन का सबसे प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव है। उनके 19 विश्वस्त साथियों के बहाने उनकी साख दांव पर लगी है। 28 विधानसभा सीटों पर मध्यप्रदेश में हो रहे उपचुनाव दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों के बीच की महज सियासी जंग नहीं है। ये उपचुनाव सीधे-सीधे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के फैसले को सही और गलत ठहराने का इम्तिहान है। इसे उनकी राजनीति की अग्निपरीक्षा भी माना जा सकता! यदि वे इस परीक्षा में सफल होते हैं, तो उनके लिए भाजपा के नए दरवाजे खुल जाएंगे। पर, यदि ऐसा नहीं होता है, तो उपचुनाव की हार का सारा खामियाजा सिंधिया पर थोपा जाना तय है। ऐसे में उनके साथी भी उनसे कन्नी काट सकते हैं। उपचुनाव की 28 में से 19 सीटें ऐसी हैं, जो सीधे सिंधिया-घराने के प्रभाव में है। 


भाजपा ने भी इनका दारोमदार पूरी तरह से सिंधिया को सौंप दिया। इन सीटों पर भाजपा की जीत का श्रेय यदि सिंधिया के खाते में दर्ज होगा, तो हार का खामियाजा भी उन्हें झेलना है। उपचुनाव के नतीजे सिर्फ शिवराज सरकार को स्थायित्व नहीं देंगे, सिंधिया की भविष्य की राजनीति के लिए भी ये निर्णायक हैं। यही कारण है कि कांग्रेस ने 'गद्दार' और 'खुद्दार' के नारे को हवा दी है। लेकिन पलड़ा किस तरह झुकेगा ये कहना मुश्किल हैं, क्योंकि उपचुनाव वाले क्षेत्रों के मतदाता खामोश हैं। वे सबकी सुन तो रहे हैं, पर बोल नहीं रहे। ये उपचुनाव सिंधिया के सियासी फैसले के अलावा भाजपा के लिए भी नाक का सवाल बन गया। क्योंकि सिंधिया गुट की बगावत ने भाजपा को जो फ़ायदा दिलाया, इस उपचुनाव के नतीजे से उस पर जनता की मुहर लगेगी। कांग्रेस यदि मतदाताओं से सहानुभूति के नाम पर वोट मांग रही है, तो भाजपा और सिंधिया ने कांग्रेस की 15 महीने की सरकार के फैसलों को कटघरे में खड़ा करके अपने पक्ष में वोट देने की अपील की है। मतदाता का एक वोट कई सारे फैसलों को सही और गलत ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।

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