लौटना चाहता हूँ ------------------------- लौट जाना चाहता हूँ दोबारा बचपन की उन संकरी सी तंग गलियों में जिनमें सिमटा था जहां सारा समेटना चाहता हूँ उस गली में बिखरे यादों के पत्तों को और सुनना चाहता हूँ उन पत्तों की खड़खड़ाहट का मधुर संगीत महसूस करना चाहता हूँ दोबारा उस गली में गूँजते पदचिन्हों की चाप, देखना चाहता हूँ दोबारा उस बरगद पर चिड़ियों का डेरा जिसकी डालों पर झूलते बीता बचपन मेरा जाना चाहता हूँ उस गली के अंतिम छोर तक और पार करना चाहता हूँ दोबारा उस पुराने घर की मीठी दहलीज को जिसे लाँघ कर गया था कड़वाहटों की दुनिया में खोलना चाहता हूँ सालों से बंद जर्जर किवाड़ अपने अंतर्मन के जिनमें कैद हैं वक्त की मार से झुक चुके पंछी कई खटखटाना चाहता हूँ बंद कमरे की खिड़की को और ढूढ़ना चाहता हूँ दुबारा उन्ही चारदीवारों में खुद को चढ़ना चाहता हूँ दोबारा उस छत की मुंडेरों पर जहाँ सूर्य सबसे पहले आकर अपनी आभा बिखेरता है साफ करना चाहता हूँ एक-दूसरे से गुथे यादों के जालों को और फँस जाना चाहता हूँ दोबारा अतीत के सुनहरे गीतों में फटका...
प्रकृति की होली चढ़ा सूरज दुनिया की सीढ़ी लिए हाथ में गुलाल अपनी लालिमा से रंगने धरती के गाल अपनी लाल चादर उसने सारे जग में फैलाई हैं हर कोने में देखो होली आई हैं, होली आई हैं मंद मंद पवन धरती का आँचल सहलाती हैं पकी खड़ी फसल खेत में लहराती हैं होली आई होली आई पावन गीत गाती हैं खिले उन्नत फूल पलाश के धरती के माथे पर तिलक लगाते हैं झूम झूम कर होली आई होली आई गाते हैं पेड़ो ने भी नया रंग ओढ़ा हैं जितना भी कहे थोड़ा है देख शोभा धरती की कण कण में मस्ती छाई हैं चारों ओर कोयल करती गुंजन कि होली आई हैं निशा की चाँदनी ने भी चाँदी सा रंग घोला हैं डाल पर बैठा हर पंछी डोला हैं हर रंग, फिजा सबने हैप्पी होली बोला हैं @पुरु शर्मा
भारत के लोक हृदय में आषाढ़ जेठ की तपन से झुलसी, दरकी और हांफती वसुंधरा के कंठ जब चातक की मानिंद प्यासे हो उठते हैं, तब कालिदास के यक्ष का मेघ-दूत केवल अलकापुरी का मार्ग नहीं नापता, बल्कि भारत के लोक-हृदय में 'आषाढ़' बनकर उतर आता है। आषाढ़ भारतीय संस्कृति के लोकाकाश में एक महा-उत्सव है, एक ऐसा अनुष्ठान है जहाँ प्रकृति और पुरुष, मेघ और मिट्टी, राग और विराग मिलकर एक नई सृष्टि का सृजन करते हैं। इस ऋतु का आगमन किसी राजा की सवारी की तरह होता है; जहाँ बादलों के नगाड़े बजते हैं, बिजलियां चंवर ढूरती हैं और पुरवाई अपने गीले हाथों से धरती का श्रृंगार करने दौड़ पड़ती है। आषाढ़ की पहली फुहार गिरते ही जो सोंधी महक उठती है, वह सदियों के लोक-जीवन, श्रम और आस्था की सामूहिक गंध है। पंडित विद्यानिवास मिश्र जब 'फागुन का मन' टटोलते हैं, तो कहीं न कहीं उनकी चेतना में आषाढ़ का वह गंभीर और गहरा रूप भी कौंधता होगा, जिसे उन्होंने 'पानी की पुकार' कहा था। आषाढ़ की इस पुकार को यदि सही मायने में सुनना हो, तो लोकगीतों की उन अनाम तानों में उतरना होगा, जहाँ बादलों की गड़गड़ाहट के बीच भी मनुष्...
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