मानवता के लिए खतरनाक है पर्यावरण से खिलवाड़
मानवता के लिए खतरनाक है पर्यावरण से खिलवाड़
स्वच्छ प्रकृति का साथ पुरखों की तरह होता है। प्रकृति का सानिध्य हमेशा हमें अपनापन देता है, संरक्षण देता है। एकमात्र यही वह जगह है जहाँ हमारी भौतिक उपलब्धियों का ब्यौरा नही लिया जाता। हमारी असफलताओं का हिसाब नही माँगा जाता है। भारतीय सनातन संस्कृति में सदियों से प्रकृति के समस्त उपादान श्रद्धा के केंद्र रहे हैं। प्रकृति हमारे दैनिक-सामाजिक जीवन को सुचारू, सरल और सहज बनाएँ रखती है, साथ ही स्वस्थमय, रचनात्मकता से भरपूर्ण परिवेश उपलब्ध कराती है जिसके सानिध्य में हम जीवन के नित नए प्रतिमान गढ़ते हैं।
किंतु आज का स्वार्थी मानव लगातार माँ स्वरूपी इस प्रकृति के सुंदर रूप से छेड़छाड़ कर रहा है। अपने निजी लाभ के लिए संसाधनों का निरंतर दोहन कर पर्यावरण असंतुलन की समस्या को जन्म दे दिया है। जिसकी परिणीति आज आपदाओं के रूप में हमारे सामने दृष्टिगोचर होती है। अभी हाल ही में उत्तराखंड के चमोली जिले में गैलिशियर पिघलने की घटना भी एक मानव जनित आपदा है। यहां यह समझना जरूरी है कि यह पूरी तरह प्राकृतिक आपदा नहीं है। हर बार एक रुकावट यानी बांध को तोड़ते हुए जब नदी में सैलाब आगे बढ़ा तो उसका रूप और भयानक होता गया और उसमें मलबा भी बढ़ता गया। इस तरह इंसानी हरकतों ने आपदा के असर को और खौफनाक बनाया।
हम त्रासदियों के दौर में जी रहे हैं और यह सब हमारे द्वारा ही सृजित किया गया है।
दुर्भाग्य है कि मनुष्य की भौतिक सुखों की चाह ने आज दुनिया को आपदाओं के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया। उत्तराखंड में पहले भी ऐसे हादसे हो चुके हैं. बेशक, इस आपदा का कारण जलवायु का बदलता मिजाज भी है, इस तूफान की शुरुआत से इसका संकेत मिलता है। लेकिन इसके नुकसान की मात्रा को देखकर यही पता चलता है कि इस क्षेत्र में इंसानी दखल भी इसकी बहुत बड़ी वजह है। बड़े हाइड्रोपावर प्रॉजेक्ट, बड़ी सड़कें, रेलवे लाइन और नदी के किनारों और तल पर निर्माण, और कुछ नहीं बड़ी आपदाओं को न्यौता देना ही है।
हमने नदियों की यात्राओं को रोक दिया। उसकी राहों में अतिक्रमण और क़ब्जे कर लिए। आज नदियां बदहवास अपने रास्ते खोज रही हैं। केंद्र में मंत्री रहते हुए उमा भारती ने कहा था कि नदियों का मार्ग निर्बाध और निष्कंटक होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी केदारनाथ त्रासदी के बाद उत्तराखंड में चलने वाले सभी बड़े प्रोजेक्टों के रिव्यू के आदेश दिए पर प्रशासनिक शिथिलता के कारण धरातल पर साकार न हो सके।
पर्यावरण के प्रति हमारी उदासीनता के सैकड़ों उदाहरण हैं। हमेशा ही हम इन आपदाओं को प्राकृतिक कहकर अपना बचाव कर लेता है। नहीं जानते कि प्रकृति से छेड़छाड़ का हर्ज़ाना भुगतना पड़ता है।
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक पिछले 20 सालों में प्राकृतिक आपदाओं में तेज वृद्धि हुई है। जिसके कारण जान और माल का नुकसान तो ही रहा है बल्कि दुनिया भर में आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। यूएन के मुताबिक एशिया सबसे ज्यादा प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हुआ है। यूएन के मुताबिक चीन में (577) और अमेरिका में (467) सबसे अधिक आपदा की घटनाएं साल 2000 से लेकर 2019 तक दर्ज की गईं। इसके बाद भारत में 321, फिलीपींस में 304 और इंडोनेशिया में 278 आपदा से जुड़ी घटनाएं दर्ज की गईं।
इन आपदाओं में दस लाख से अधिक लोगों की मौत हुई और 4.2 अरब लोग प्रभावित हुए। दो दशक के दौरान 2.97 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान भी दर्ज किया गया। संयुक्त राष्ट्र ने पिछले वर्ष "अंतरराष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस" के मौके पर इस रिपोर्ट को जारी किया था।
वहीं भारत में हर साल औसतन 1654 लोग पानी की भेंट चढ़ जाते हैं।
मार्च 2018 में राज्यसभा में बारिश और बाढ़ से जुड़े पूछे गए एक सवाल पर केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि 1953 से लेकर 2017 तक बारिश और बाढ़ की वजह से देश को 3 लाख 65 हजार 860 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था। 1 लाख से ज्यादा लोग (1,07,487) बाढ़ और बारिश की भेंट चढ़ गए।
इस सारी आपदाओं में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मनुष्य का स्वार्थ और लालच ही हैं जिसका हर्ज़ाना अक्सर ऐसे मनुष्य भुगतते हैं जो इसके लिए दोषी भी नहीं, न ही वे ऐसी तरक्की चाहते हैं। और देखिए, ऐसी आपदाओं के समय मनुष्य सिर्फ अपनी ही गिनती करता है। उन मूक प्राणियों को भी भूल जाता है जो इसकी चपेट में आए और उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था। पशु एक संसार के सबसे वंचित, शोषित और उत्पीड़ित जाति है। जिनके बारे में अपने थोथे अधिकारों के लिए आंदोलन करने वाला मनुष्य बात भी करने के लिए तैयार नही हैं।
ईश्वर हमें सद्बुद्धि दे और हमें प्रकृति को यूँ बर्बाद करने से बचाए। पर्यावरण हमारी पुरखों की धरोहर है, जिसे हमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजना है, संभलना है। मानवता का अस्तित्व बचा रहे इसके लिए आवश्यक है कि प्रकृति का वास्तविक स्वरूप बना रहे। इसके लिए हमें प्रयास करने होंगे अन्यथा आने वाला समय भयावह आपदाओं से भरा होगा।
- पुरु शर्मा, भोपाल
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