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कोरोना वायरस से बचाव के उपाय

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कोरोना वायरस से बचाव के उपाय कोरोना वायरस (प्राण घातक) जो चीन में तेजी से फैलता जा रहा है, जिसका भारत में भी आने का खतरा है, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लोगों से इनमे से कुछ सावधानियाँ बरतने को कहा है । कोरोना वायरस से बचाव के लिए निम्न सावधानियां बरतें: 1 . पानी उबालकर पियें । 2 . मांसाहार खाना बंद कर दें । 3. आहार में विटामिन सी, जिंक और विटामिन बी कॉन्प्लेक्स देने वाले पदार्थों की मात्रा बढ़ा दें । 4 . व्यक्तिगत स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें । 5 . तुलसी, अदरक, काली मिर्च, मिश्री और कुछ बूंदे नींबू की डालकर काढ़ा बनाकर पीए l 6 . गिलोय का सेवन सुबह खाली पेट करें । 7 . भोजन में सब्जियों का सूप भी लें । 8 . किसी भी प्रकार का पेय पदार्थ (कोल्ड ड्रिंक्स) आइसक्रीम, कुल्फी आदि खाने से बचें । 9 .किसी भी प्रकार का बंद डिब्बा भोजन, पुराना बर्फ का गोला, सील बंद दूध तथा दूध से बनी हुई मिठाइयाँ जो कि 48 घंटे से पहले की बनी हो उसे नहीं खावे। इन सभी चीजों का इस्तेमाल  कम से कम 90 दिनों तक न करें। 10. विश्व स्वास्थ्य संगठन क...

दिल्ली नतीजे : पारंपरिक राजनीति पर करारा तमाचा

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दिल्ली नतीजें : पारंपरिक राजनीति पर करारा तमाचा? दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजें आ चुके हैं और जैसा कि अनुमान था अरविंद केजरीवाल दोबारा दिल्ली के मुख्यमंत्री होंगे। इस चुनाव की बढ़ी बात यह रही कि तमाम भटकावों के प्रयास के बीच दिल्ली की जनता ने केजरीवाल व उनके कार्यों, योजनाओं पर अपना भरोसा कायम रखा और देश के तमाम राजनैतिक दलों को संदेश दिया कि सियासी पैंतरेबाजी छोड़कर जमीन पर आएं। इसे मतदाताओं व मुद्दों की जीत के तौर पर भी देखा जा सकता है।  चुनाव के दौरान केजरीवाल ने प्रधानमंत्री पर कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की, बल्कि उनके आर्थिक मॉडल की आलोचना की तथा देश में बढ़ती महंगाई बेरोज़गारी को मुद्दा बनाया और चुनाव को भारत-पाकिस्तान की जगह स्थानीय मुद्दों पर बनाएं रखा। इसके साथ ही जनता के बीच में अपने विकास कार्यों का प्रचार-प्रसार किया। हालाँकि यह बात अलग है कि आम आदमी पार्टी अपने पिछले कार्यकाल में किए वादों का 25% ही कर पाई लेकिन फिर भी जनता को अपनी ओर आकर्षित कर पाने सफल हुई और अंत में केजरीवाल की फ्री स्कीम जैसे बिजली और पानी, स्वास्थ्य इत्यादि इस चुनाव में हिट साबित हुए।...

जेएनयू की साख बची रहने दो!

जेएनयू को जनतांत्रिक शिक्षण संस्कृति के लिए जाना जाता है। जेएनयू की एक पूरी सांस्कृतिक विरासत है। जिसके निर्माण के पीछे एक विचार था देश में एक ऐसे शिक्षण संस्थान की स्थापना का जिसमें बौद्धिक खुलेपन, विकास-विवाद, सहमति-असहमति और स्वतंत्र जीवन शैली की पूरी गुंजाइश हो, जहाँ पैसे की तंगई प्रतिभाओं के आड़े न आएं। परिणामस्वरूप जेएनयू भारत के दूरदराज के इलाकों के दलित, आदिवासी, गरीब और पिछड़े वर्ग के प्रतिभाशाली छात्रों के सपनों को साकार करने वाला संस्थान बन गया। यहाँ संघर्ष का इतिहास लंबा है। छात्र हितों के लिए जेएनयू से हमेशा आवाज उठती रही है। ताजा मामला फीस वृद्धि का है जिसको लेकर जेएनयू छात्र सड़क पर है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार की न्यूनतम प्राथमिकता मुफ़्त शिक्षा और स्वास्थ्य की होती है। शिक्षा पर सभी का समान अधिकार हो तथा सभी तक इसकी पहुँच हो इसके हेतु सरकार को प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए। जेएनयू छात्रों का यह प्रदर्शन वाज़िब है लेकिन काश जेएनयू के छात्र आत्मकेंद्रित न होकर देशभर के छात्रों की समस्या एवं महँगी होती शिक्षा को अपना मुख्य मुद्दा बनाते। आज जेएनयू को लेकर भारतीय-समाज दो ...

लास्ट बेंच

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सुनो ! क्या याद हैं तुम्हे वो लास्ट ब्रेंच हाँ वही लास्ट ब्रेंच जिस पर साथ बैठते थे हम जहाँ से बांधे थे हमने कई धागे  प्रेम के, विश्वास के, मित्रता के जहाँ आलू के पराठे के साथ बांटे थे सुख-दुःख और बुने थे कुछ अधपके-कच्चे ख्वाब इसी ब्रेंच से शुरू किया था चलना यही से सीखा था जिंदगी जीने का सलीका इस ब्रेंच पर सदियां सिमट जाती थी चंद घण्टों में इन चंद लम्हों में थम जाती थी यहाँ सँजोए थे सपने और इन सपनों को मुठ्ठी में भरने की खींचा था खाका इसी लास्ट ब्रेंच से नापा था हमने सपनों का असीम आकाश उड़े थे साथ इस आकाश को कब्जाने को यहाँ सजाई थी हमने साथ मिलकर महफिले  बुना था यादों का एक सुनहरा ताना बाना यही से चले थे हम दोनों एक-दूसरे के हाथों में हाथ दिए एक ऐसी अंनत यात्रा पर जिसमें मेरी मंजिल तुम और तुम्हारी मंजिल मैं होता था पर आजकल उन राहों पर काँटे से उग आए हैं जिनपर चलने के पक्के वादे तुमने मुझसे लिए थे काटें जाने कैसे उग आए   शायद हमारे एहसासों की नमी में कोई कमी आ गयी है  या फिर , या फिर हमने खुद बो लिए हो  य...

बरगदों की घटती संख्या से बढ़ता पर्यावरण संकट

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बरगदों की घटती संख्या से बढ़ता पर्यावरण संकट बरगद वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व वाला वृक्ष है और लगभग सभी धर्म ग्रंथों में बरगद के महत्व का बार-बार उल्लेख किया गया है। संतों ने इसका ध्यान करते हुए बताया है कि यह भगवान के रूप में पूजनीय था और मैत्रीय गुणों से परिपूर्ण था जिसके कारण वे जीवन भर इसके अधीन रहे। यह उदाहरण है कि मानव जाति के लिए (और अन्य पेड़ों के साथ) बरगद के पेड़ कितने महत्वपूर्ण थे। समय के अनुसार, बरगद के पेड़ों की संख्या में कमी आई है, क्योंकि इसे अस्तित्व के लिए बहुत जगह की आवश्यकता है, जो अचल संपत्ति को सशक्त बनाने की शर्तों के खिलाफ था इसलिए एक के बाद एक पुराने बरगद के पेड़ों को काटकर फेंक दिया गया या जला दिया गया, ताकि 'सभ्यता' को जगह दी जा सके। आज हम कम भूजल स्तर, बढ़ते प्रदूषण, अस्थमा जैसी बीमारियों की शिकायत करते हैं लेकिन कभी भी यह सवाल करने की कोशिश नहीं करते कि ऐसा क्यों हो रहा है। हम फैंसी घर चाहते हैं, इसलिए हम बिना किसी हिचकिचाहट या चिंता के पेड़ों को काटते हैं। बरगद के पेड़ भूजल स्तर को खींचते और पकड़ते हैं, यह हमारे स्वास्थ्य और कल्याण क...

प्लास्टिक: कभी खत्म न होने वाला उग्र युद्ध

प्लास्टिक: कभी खत्म न होने वाला उग्र युद्ध  प्लास्टिक, हमारे रोजमर्रा के जीवन में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली सामग्री में से एक है, इसकी विशाल लोकप्रियता और संरचनात्मक गुणों के कारण, बहुत अधिक नकारात्मक ध्यान इकट्ठा करना शुरू कर दिया है। आज बाजार में हजारों उत्पाद प्लास्टिक में पैक किए जाते हैं, जिनमें से प्रमुख हिस्सा उपभोक्ता ड्यूरेबल्स और पर्सनल केयर उत्पादों द्वारा प्राप्त किया जाता है। चिलचिलाती गर्मी में आपके द्वारा खरीदी जाने वाली हर क्रीम, चिप्स का पैकेट, बिस्किट पैक और पैकेज्ड पेय पदार्थ प्लास्टिक से बने होते हैं। यदि आप लेबल को ध्यान से पढ़ते हैं, तो आप आसानी से निर्देश पा सकते हैं कि ऐसे पैकेजों का निस्तारण कहाँ से किया जाए ताकि उन्हें उचित पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग के लिए भेजा जा सके, लेकिन लेबल पढ़ता ही कौन है ?! खैर, चीजों को गंभीरता से लेने की हमारी अक्षमता हमें एक ऐसी स्थिति में ले गई है जहां, अगर रिपोर्टों पर विश्वास किया जाए, तो 2050 तक महासागरों में मछली की तुलना में अधिक प्लास्टिक होगा। जबकि हम चिप्स के अपने पैकेट का आनंद ले रहे हैं, इंटरनेट पर प्ल...

करीला धाम : जहाँ विराजती माँ जानकी

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loading... विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं की रमणीय वादियों की गोद में बसा अलौकिक शक्ति और आस्था का केंद्र करीला धाम। शहर के कोलाहल से दूर, शांतिमय वातावरण में हरितमा की चादर ओढ़े विंध्य की हसीन वादियों से घिरा भगवान वाल्मीकि का आश्रम। यहाँ की पावन धरा पर पहुँचते ही सांसारिक मायाजाल में जकड़े मानव की समस्त व्याधियों का समाधान करती हैं माँ जानकी। माँ जानकी का यह मंदिर यहाँ आने वाले हर आगन्तुक को अपनी ओर आकर्षित करने में पूर्णतः सक्षम हैं। वाल्मीकि आश्रम और लव कुश की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध इस पावन भूमि की महिमा अपरंपार हैं। यहाँ का रमणीय वातावरण और माँ जानकी की आलौकिक छटा पर्यटकों और श्रद्धालुओं को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। बरसात के मौसम में पूरी घाटी हरितमा की चादर ओढ़ लेती हैं, जिसे देखना मनमोहक होता हैं और सर्दियों के समय इन घाटियों पर चाँदी सी चमकती धुंध छा जाती हैं। मंदिर के निकट ही विंध्याचल की घाटियों की तलहटी में माँ जानकी के चरणों को धोती हुई श्वेत धवल चाँदनी सी चमकती कोंचा नदी लहराती हुई चट्टानों के बीच से गुजरती हैं।   जिला मुख्यालय अशोकनगर से 3...